भोपाल में रहवासी इलाकों में कारोबार को लेकर SC में सुनवाई टली, 62500 प्रतिष्ठानों को अभी करना होग इंतजार
कार्रवाई के दौरान कई स्थानों पर व्यापारियों ने विरोध किया था। व्यापारिक संगठनों ने समान कार्रवाई की मांग करते हुए छोटे कारोबारियों पर ही कार्रवाई किए जाने के आरोप भी लगाए। इससे मामला केवल कानूनी नहीं रहा, बल्कि शहर की व्यापारिक व्यवस्था और आवासीय क्षेत्रों की प्लानिंग से भी जुड़ गया है।
MP News: भोपाल में आवासीय इलाकों में चल रही व्यावसायिक गतिविधियों पर चल रहे विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई टल गई है। केस से संबंधित जज के मंगलवार को अवकाश पर जाने के कारण आज सुनवाई नहीं की जा सकी। ऐसे में 62500 व्यापारियों को अब मामले में और इंतजार करना पड़ेगा। भोपाल में रहवासी इलाकों में चल रही व्यवसायिक गतिविधियों पर भोपाल नगर निगम ने कोर्ट के आदेश पर सीलिंग की कार्रवाई की थी। जिसको लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई गई थी। हालांकि अब सुनवाई के लिए अगली तारीख तय नहीं की गई है।
62,500 व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर पड़ेगा प्रभाव
इस मामले का असर शहर के करीब 62,500 व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर पड़ सकता है। नगर निगम ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद आवासीय क्षेत्रों में संचालित कारोबार की पहचान कर कार्रवाई शुरू की थी। निगम की ओर से अब तक की कार्रवाई की रिपोर्ट अदालत में पेश की जा चुकी है। दूसरी तरफ रहवासी पक्ष ने निगम की रिपोर्ट पर आपत्ति जताते हुए अपने दस्तावेज अदालत के सामने रखे हैं।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को बाद अगस्त में नगर निगम ने शहर में आवासीय उपयोग वाली संपत्तियों में चल रहे व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के खिलाफ अभियान शुरू किया था। निगम के सर्वे में करीब 62,500 प्रतिष्ठान कार्रवाई के दायरे में बताए गए। इनमें से हजारों संस्थानों को चरणबद्ध तरीके से नोटिस जारी किए गए। नगर निगम की कार्रवाई में पहले नोटिस और फिर अंतिम चेतावनी का प्रावधान रखा गया। अलग-अलग रिपोर्टों के मुताबिक अगस्त के अंत तक 8 हजार से ज्यादा प्रतिष्ठानों को नोटिस दिए जा चुके थे। इसके बाद कई इलाकों में निगम की टीमें कार्रवाई के लिए पहुंचीं।
छोटे कारोबारियों पर ही कार्रवाई किए जाने का आरोप
निगम ने करीब तीन दिन तक सीलिंग और बंद कराने की कार्रवाई की। इस दौरान कुल 190 प्रतिष्ठानों पर कार्रवाई की गई। इसके बाद व्यापारियों के विरोध और बढ़ते दबाव के बीच अभियान रोक दिया गया। पिछले करीब दो सप्ताह से बड़े स्तर पर नई सीलिंग कार्रवाई नहीं हुई है।
कार्रवाई के दौरान कई स्थानों पर व्यापारियों ने विरोध किया था। व्यापारिक संगठनों ने समान कार्रवाई की मांग करते हुए छोटे कारोबारियों पर ही कार्रवाई किए जाने के आरोप भी लगाए। इससे मामला केवल कानूनी नहीं रहा, बल्कि शहर की व्यापारिक व्यवस्था और आवासीय क्षेत्रों की प्लानिंग से भी जुड़ गया है।
रहवासियों ने निगम की कार्रवाई पर उठाए सवाल
दूसरी ओर इस मामले में याचिकाकर्ता और रहवासी पक्ष निगम की कार्रवाई को लेकर संतुष्ट नहीं है। याचिकाकर्ता विवेक त्रिपाठी का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में निगम की एक्शन टेकन रिपोर्ट पर आपत्ति दर्ज कराई गई है। उनका दावा है कि जिन प्रतिष्ठानों को सील किए जाने की बात रिपोर्ट में कही गई, उनमें से कुछ दोबारा खुल गए हैं।
रहवासी पक्ष का आरोप है कि कार्रवाई सभी इलाकों में एक समान नहीं हुई। आवासीय क्षेत्रों में लंबे समय से व्यावसायिक गतिविधियों के कारण यातायात, पार्किंग और स्थानीय निवासियों की परेशानी बढ़ रही है। इससे पहले भी रहवासियों की ओर से निगम पर प्रभावी कार्रवाई नहीं करने के आरोप लगाए जाते रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर निगम ने की थी कार्रवाई
इस पूरे विवाद में 5 अगस्त का सुप्रीम कोर्ट का आदेश अहम है। अदालत ने मध्य प्रदेश सरकार की ओर से बनाई गई 10 सदस्यीय समिति की कार्रवाई पर रोक लगाई थी। इसके साथ ही अदालत ने संबंधित मामलों में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से कारोबारियों को मिली राहत पर भी कड़ा रुख अपनाया था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि अदालत के निर्देश पर चल रही प्रक्रिया में किसी दूसरे प्रशासनिक आदेश के जरिए हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। इसके बाद नगर निगम को आवासीय क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उसकी रिपोर्ट अदालत में पेश करनी थी।
अब 15 सितंबर की सुनवाई भी टलने के बाद फिलहाल स्थिति जस की तस बनी हुई है। कारोबारियों के लिए राहत या आगे सीलिंग कार्रवाई को लेकर तस्वीर अगली सुनवाई के बाद ही साफ होगी। वहीं रहवासी पक्ष की नजर इस बात पर है कि सुप्रीम कोर्ट निगम की कार्रवाई और उसकी रिपोर्ट पर क्या रुख अपनाता है।
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